सोमवार, 24 जून 2013

यह हैं धृतराष्ट्र के सौ पुत्रों के नाम


यह हैं धृतराष्ट्र के सौ पुत्रों के नाम

महर्षि वेदव्यास के कथनानुसार गांधारी के पेट से निकले मांस पिण्ड से सौ पुत्र व एक पुत्री ने जन्म लिया। महाभारत के आदिपर्व के अनुसार उनके नाम यह हैं-

गांधारी का सबसे बड़ा पुत्र था दुर्योधन। उसके बाद दु:शासन, दुस्सह, दुश्शल, जलसंध, सम, सह, विंद, अनुविंद, दुद्र्धर्ष, सुबाहु, दुष्प्रधर्षण, दुर्मुर्षण, दुर्मुख, दुष्कर्ण, कर्ण, विविंशति, विकर्ण, शल, सत्व, सुलोचन, चित्र, उपचित्र, चित्राक्ष, चारुचित्र, शरासन, दुर्मुद, दुर्विगाह, विवित्सु, विकटानन, ऊर्णनाभ, सुनाभ, नंद, उपनंद, चित्रबाण, चित्रवर्मा, सुवर्मा, दुर्विमोचन, आयोबाहु, महाबाहु, चित्रांग, चित्रकुंडल, भीमवेग, भीमबल, बलाकी, बलवद्र्धन, उग्रायुध, सुषेण, कुण्डधार, महोदर, चित्रायुध, निषंगी, पाशी, वृंदारक, दृढ़वर्मा, दृढ़क्षत्र, सोमकीर्ति, अनूदर, दृढ़संध, जरासंध, सत्यसंध, सद:सुवाक, उग्रश्रवा, उग्रसेन, सेनानी, दुष्पराजय, अपराजित, कुण्डशायी, विशालाक्ष, दुराधर, दृढ़हस्त, सुहस्त, बातवेग, सुवर्चा, आदित्यकेतु, बह्वाशी, नागदत्त, अग्रयायी, कवची, क्रथन, कुण्डी, उग्र, भीमरथ, वीरबाहु, अलोलुप, अभय, रौद्रकर्मा, दृढऱथाश्रय, अनाधृत्य, कुण्डभेदी, विरावी, प्रमथ, प्रमाथी, दीर्घरोमा, दीर्घबाहु, महाबाहु, व्यूढोरस्क, कनकध्वज, कुण्डाशी और विरजा। 

गांधारी की पुत्री का नाम दुश्शला था जिसका विवाह राजा जयद्रथ के साथ हुआ था।

कैसे हुआ कौरवों का जन्म ?


कैसे हुआ कौरवों का जन्म ?

एक बार महर्षि वेदव्यास हस्तिनापुर आए। गांधारी ने उनकी बहुत सेवा की। जिससे प्रसन्न होकर उन्होंने गांधारी को वरदान मांगने को कहा। गांधारी ने अपने पति के समान ही बलवान सौ पुत्र होने का वर मांगा। समय पर गांधारी को गर्भ ठहरा और वह दो वर्ष तक पेट में ही रहा। इससे गांधारी घबरा गई और उसने अपना गर्भ गिरा दिया। उसके पेट से लोहे के समान एक मांस पिण्ड निकला। 

महर्षि वेदव्यास ने अपनी योगदृष्टि से यह सब देख लिया और वे तुरंत गांधारी के पास आए। तब गांधारी ने उन्हें वह मांस पिण्ड दिखाया। महर्षि वेदव्यास ने गांधारी से कहा कि तुम जल्दी से सौ कुण्ड बनवाकर उन्हें घी से भर दो और सुरक्षित स्थान में उनकी रक्षा का प्रबंध कर दो तथा इस मांस पिण्ड पर जल छिड़को। जल छिड़कने पर उस मांस पिण्ड के एक सौ एक टुकड़े हो गए। 

व्यासजी ने कहा कि मांस पिण्डों के इन एक सौ एक टुकड़ों को घी से भरे कुण्डों में डाल दो। अब इन कुण्डों को दो साल बाद ही खोलना। इतना कहकर महर्षि वेदव्यास तपस्या करने हिमालय पर चले गए। समय आने पर उन्हीं मांस पिण्डों से पहले दुर्योधन और बाद में गांधारी के 99 पुत्र तथा एक कन्या उत्पन्न हुई।

कर्ण को सूर्यपुत्र क्यों कहते हैं?


कर्ण को सूर्यपुत्र क्यों कहते हैं?

महाभारत में कई ऐसे पात्र हैं जो अलग-अलग बातों के लिए जानें जाते हैं। ऐसे ही एक पात्र हैं कर्ण, जो अपनी दानवीरता के लिए प्रसिद्ध हैं। कर्ण को सूर्यपुत्र भी कहते हैं। कर्ण के जन्म का पूरा वृतांत महाभारत के आदिपर्व में है। 

यदुवंशी राजा शूरसेन की एक कन्या थी जिसका नाम पृथा था। इस कन्या को शूरसेन ने अपनी बुआ के संतानहीन पुत्र कुंतीभोज को दे दिया। इस प्रकार पृथा कुंती के नाम से प्रसिद्ध हुई। कुंती जब छोटी थी तो ऋषियों की सेवा करने में उसे बड़ा आनन्द आता था। एक बार कुंती ने महर्षि दुर्वासा की बड़ी सेवा की। जिससे प्रसन्न होकर दुर्वासा ने उसे एक मंत्र दिया और कहा कि इस मंत्र से तुम जिस देवता का आवाहन करोगी, उसी की कृपा से तुम्हें पुत्र उत्पन्न होगा। दुर्वासा ऋषि की बात सुनकर कुंती को बड़ा आश्चर्य हुआ। 

उसने एकांत में जाकर भगवान सूर्य का आवाहन किया। सूर्यदेव ने आकर तत्काल कुंती को गर्भस्थापन किया, जिससे तेजस्वी कवच व कुंडल पहने एक सर्वांग सुंदर बालक उत्पन्न हुआ। उस समय कुंती कुंवारी थी इसलिए उसने कलंक के भय से उस बालक को छिपाकर नदी में बहा दिया। रथ चलाने वाले अधिरथ ने उसे निकाला और अपनी पत्नी राधा के पास ले जाकर उसे पुत्र बना लिया। उसका नाम वसुषेण रखा गया। यही वसुषेण आगे जाकर कर्ण के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

गांधारी ने क्यों बांधी आंखों पर पट्टी?


गांधारी ने क्यों बांधी आंखों पर पट्टी?

पाण्डु के राज्याभिषेक के बाद भीष्म ने धृतराष्ट्र, पाण्डु व विदुर का विवाह करने का विचार किया। भीष्म ने सुना कि गांधारराज सुबल की पुत्री गांधारी सब लक्षणों से सम्पन्न है और उसने भगवान शंकर की आराधना कर सौ पुत्रों का वरदान भी प्राप्त किया है। तब भीष्म ने गांधारराज के पास धृतराष्ट्र के विवाह के लिए प्रस्ताव भेजा जिसे सुबल ने स्वीकार कर लिया। गांधारी को जब पता चला कि धृतराष्ट्र अंधे हैं तो उसने अपनी आंखों पर भी पट्टी बांध ली और जीवन भर इस प्रकार रहकर अपने पति की सेवा करने का निश्चय किया। इस तरह धृतराष्ट्र का विवाह गांधारी से हो गया। 

यदुवंशी शूरसेन की पृथा नाम की कन्या थी। इस कन्या को शूरसेन ने अपनी बुआ के संतानहीन लड़के कुन्तीभोज को गोद दे दिया था। इस प्रकार पृथा कुंती के नाम से प्रसिद्ध हुई। कुंती जब विवाह योग्य हुई तो कुंतीभोज ने स्वयंवर का आयोजन किया जिसमें कुंती ने पाण्डु को जयमाला पहनाई। इस तरह पाण्डु का विवाह कुंती से हो गया। तब भीष्म ने पाण्डु के एक और विवाह करने का निश्चय किया तथा मद्रराज के राजा शल्य की बहन माद्री से पाण्डु का विवाह किया। पाण्डु कुंती व माद्री के साथ सुखपूर्वक रहने लगे।

इसके बाद भीष्म ने राजा देवक की दासीपुत्री जो गुणों में विदुर के समान ही थी, का विवाह विदुर से करवा दिया।

पाण्डु को ही क्यों बनाया गया राजा?


पाण्डु को ही क्यों बनाया गया राजा?

महर्षि वेदव्यास की कृपा से ही कुरुवंश में धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर ने जन्म लिया। उन दिनों भीष्म बड़ी लगन से धर्म की रक्षा और राज्य का काम-काज देखते थे। धृतराष्ट्र, पाण्डु व विदुर के कार्य देखकर हस्तिनापुरवासियों को बड़ी प्रसन्नता होती थी। भीष्म बड़ी सावधानी से राजकुमारों की रक्षा करते थे। जब ये तीनों बड़े हुए तो भीष्म ने उनकी शिक्षा का उचित प्रबंध किया। 

इस प्रकार धृतराष्ट्र, पाण्डु व विदुर तीनों ने ही अपने-अपने अधिकारानुसार अस्त्र व शास्त्रज्ञान का अध्ययन किया। पाण्डु की रुचि शस्त्र ज्ञान में अधिक थी वे श्रेष्ठ धनुर्धर थे और सबसे बलशाली थे धृतराष्ट्र, उनमें अनेक हाथियों का बल था। विदुर के समान धर्म को जानने वाला संसार में कोई और नहीं था। जब ये तीनों युवा हुए तो भीष्म ने सत्यवती की सम्मति से किसी एक को राज्य का भार सौंपने का विचार किया। धृतराष्ट्र जन्म से ही अंधे थे और विदुर दासी पुत्र, इसलिए वे दोनों राज्य के अधिकारी नहीं माने गए। 

इस प्रकार सर्वसम्मति से पाण्डु को राज्य का अधिकारी माना गया। भीष्म ने बड़े उत्साह से पाण्डु का राज्याभिषेक किया।

धृतराष्ट्र अंधे व पाण्डु पीले क्यों थे?



धृतराष्ट्र अंधे व पाण्डु पीले क्यों थे?

अंबिका व अंबालिका से विवाह होने के बाद विचित्रवीर्य दोनों पत्नियों के साथ प्रेम से रहने लगे। इस तरह सात वर्ष खुशी-खुशी बीत गए। लेकिन इसके बाद यौवनावस्था में ही विचित्रवीर्य को क्षय रोग हो गया। बहुत उपचार करने के बाद भी विचित्रवीर्य बिना संतान उत्पन्न किए ही स्वर्गवासी हो गए। तब हस्तिनापुर का सिंहासन खाली हो गया। तब माता सत्यवती ने भीष्म को कहा कि वे काशीनरेश की कन्याओं के द्वारा संतान उत्पन्न कर अपने वंश की रक्षा करें। तब भीष्म ने अपनी प्रतिज्ञा को न तोडऩे का संकल्प दोहराया। 

भीष्म की प्रतिज्ञा सुनकर सत्यवती ने अपने पुत्र महर्षि वेदव्यास को बुलाया। महर्षि व्यास के आने पर सत्यवती ने उन्हें विचित्रवीर्य के क्षेत्र में संतान उत्पन्न करने के लिए कहा। माता की आज्ञा मानकर व्यासजी ने अंबिका से धृतराष्ट्र व अंबालिका से पाण्डु को उत्पन्न किया। जब अंबिका व्यासजी के पास गई तो उन्हें देखकर उसने अपनी आंखें बंद कर ली इसी कारण धृतराष्ट्र जन्म से ही अंधे हुए। अंबालिक जब व्यासजी के पास गई तो उन्हें देखकर उसका शरीर पीला हो गया। इसी कारण पाण्डु पीले व कमजोर हुए। तब अंबिका की प्रेरणा से उसकी दासी ने व्यासजी के द्वारा ही विदुर को उत्पन्न किया।

इस तरह धृतराष्ट्र, पाण्डु व विदुर से कुरुवंश आगे बढ़ा। 

भीष्म ने क्यों किया काशी के राजा की पुत्रियों का...


भीष्म ने क्यों किया काशी के राजा की पुत्रियों का...

भरतवंशी राजा शांतनु को पत्नी सत्यवती से दो पुत्र हुए- चित्रांगद और विचित्रवीर्य। दोनों ही बड़े होनहार व पराक्रमी थे। अभी चित्रांगद ने युवावस्था में प्रवेश भी नहीं किया था कि राजा शांतनु स्वर्गवासी हो गए। तब भीष्म में माता सत्यवती की सम्मति से चित्रांगद को राजगद्दी पर बैठाया। लेकिन कुछ समय तक राज करने के बाद ही उसी के नाम के गंधर्वराज चित्रांगद ने उसका वध कर दिया। तब भीष्म में विचित्रवीर्य को राजा बनाया।

जब भीष्म ने देखा कि विचित्रवीर्य युवा हो चुका है तो उन्होंने उसका विवाह करने का विचार किया। उन्हीं दिनों काशी के राजा की तीन कन्याओं का स्वयंवर भी हो रहा था। लेकिन काशी नरेश ने द्वेषतापूर्वक हस्तिनापुर को न्योता नहीं दिया। क्रोधित होकर भीष्म अकेले ही स्वयंवर में गए और वहां उपस्थित सभी राजाओं व काशी नरेश को हराकर उनकी तीनों कन्याओं अंबा, अंबिका व अंबालिका को हर लाए। तब काशी नरेश की बड़ी पुत्री अंबा ने भीष्म से कहा कि वह मन ही मन में राजा शाल्व को अपना पति मान चुकी है। यह बात जानकर भीष्म ने अंबा को उसके इच्छानुसार जाने की अनुमति दे दी तथा शेष दो कन्याओं का विवाह विचित्रवीर्य से कर दिया।